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Saturday, December 19, 2020

नए कृषि कानूनों से बिचौलियों में हड़कंप- मंत्री पटेल का दावा

Saturday, 19th December 2020 at 20:11 IST

  हरदा के ग्राम धुरगाड़ा में विधेयकों के समर्थन में चौपाल आयोजित 

भोपाल: 19 दिसम्बर 2020:, (मध्यप्रदेश स्क्रीन ब्यूरो)::

भारतीय जनता पार्टी की तरफ से किसानों के आंदोलन का मुकाबला जारी है। इस मकसद के लिए चौपालों का अयिजन भी किया जा रहा है। हाल ही में एक चौपाल हरदा के गांव धुरवाड़ा में भी आयोजित की गई जिसमें किसान कल्याण तथा कृषि विकास मंत्री श्री कमल पटेल भी पहुंचे। 

किसान कल्याण तथा कृषि विकास मंत्री श्री कमल पटेल ने कहा है कि नवीन कृषि कानूनों से बिचौलियों में हड़कंप मचा है। उन्होंने कहा कि अब तक बिचौलिए किसानों के लाभ को हजम कर जाते थे। इन कानूनों के आने के बाद किसानों को उनका वाजिब हक मिलेगा। श्री पटेल ने यह बात हरदा जिले के ग्राम धुरगाड़ा में नवीन कृषि विधेयकों के समर्थन में आयोजित किसान चौपाल में कहीं।

मंत्री श्री पटेल ने नए कृषि विधेयकों के समर्थन में आयोजित चौपाल में कहा कि विधेयक किसानों के हित में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा लाए गए हैं। इनसे किसानों की आय बढ़ेगी। खेती का उन्नत स्वरूप विकसित होगा। गांव में कृषि आधारित अधोसंरचनात्मक विकास होगा। किसान अपने उद्योग खुद लगा सकेंगे।   वे किसान के साथ-साथ उद्योगपति भी बन सकेंगे। श्री पटेल ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री मोदी के संबोधन से किसानों में सकारात्मकता का भाव आया है। किसान अब आगे बढ़कर नवीन कृषि विधेयकों का समर्थन कर रहे हैं। ग्राम धुरगाड़ा में भी किसानों ने नारे लगाए कि वे नवीन कृषि विधेयकों के मामले में केंद्र और प्रदेश सरकार के साथ हैं। उनका पूरा- पूरा समर्थन नवीन कृषि विधेयकों के लिए है।

           किसान चौपाल में मंत्री श्री पटेल ने किसानों को आश्वस्त किया कि मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्र में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार किसानों की आय को न सिर्फ दुगुना करेगी बल्कि किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त और समृद्ध बनाने का हर मुमकिन प्रयास करेगी।


Saturday, October 31, 2020

राष्ट्रीय एकता दिवस के उपलक्ष में आयोजित मार्चपास्ट

 देशभक्ति गीतों की धुनों से बना विशेष माहौल 


सागर
: 31 अक्टूबर 2020: (मध्य प्रदेश स्क्रीन ब्यूरो)::

सरदार बल्लभ भाई पटेल की जयंती के अवसर पर शनिवार को स्थानीय पुलिस प्रशिक्षण मैदान में राज्य पुलिस और अन्य वर्दीधारी बलों तथा अन्य एजेन्सियों द्वारा भव्य मार्चपास्ट का आयोजन किया गया। जिसमें देशभक्ति गानों की धुनें प्रस्तुत की गई। इस अवसर पर कलेक्टर श्री दीपक सिंह, पुलिस अधीक्षक श्री अतुल सिंह, नगर निगम कमिश्नर श्री आरपी अहिरवार नगर दण्डाधिकारी श्री प्रकाश नायक, डीआईजी श्री वर्मा, उपायुक्त डॉ. प्रणय कमल खरे सहित अन्य अधिकारी कर्मचारी मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन श्री अरविन्द जैन ने किया।  

Thursday, October 22, 2020

हम किसी और के संसार में रहने लगे है ....

Thursday: 22nd October 2020, 14:41 IST 

जनसाधारण की भागीदारी  से ही सम्भव है असली  विकास प्रक्रिया   


भोपाल:  22 अक्टूबर 2020: (*धर्मपाल//मध्यप्रदेश स्क्रीन)::

भारतीय मानस में सृष्टि के विकास के क्रम और उसमें मानवीय प्रयत्न और मानवीय ज्ञान-विज्ञान के स्थान की जो छवि अंकित है, वह आधुनिकता से इस प्रकार विपरीत है तो इस विषय पर गहन चिंतन करना पड़ेगा। यहां के तंत्र हम बनाना चाहते हैं और जिस विकास प्रक्रिया को यहां आरंभ करना चाहते हैं, वह तो तभी यहां जड़ पकड़ पाएगी और उसमें जनसाधारण की भागीदारी तो तभी हो पायेगी जब वह तंत्र और विकास प्रक्रिया भारतीय मानस और काल दृष्टि के अनुकूल होगी। इसलिए इस बात पर भी विचार करना पडे़गा कि व्यवहार में भारतीय मानस पर छाए विचारों और काल की भारतीय समझ के क्या अर्थ निकलते है? किस प्रकार के व्यवहार और व्यवस्थाएं उस मानस व काल में सही जँचते हैं? सम्भवत: ऐसा माना जाता है कि मानवीय जीवन और मानवीय ज्ञान की क्षुद्रता का जो भाव भारतीय सृष्टि-गाथा में स्पष्ट झलकता है, वह केवल अकर्मण्यता को ही जन्म दे सकता है पर यह तो बहुत सही बात है। किसी भी विश्व व काल दृष्टि का व्यवाहारिक पक्ष तो समय सापेक्ष होता है। अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग समय पर उस दृष्टि की अलग-अलग व्याख्याएं होती जाती हैं। इन व्याख्याओं से मूल चेतना नहीं बदलती पर व्यवहार और व्यवस्थाएं बदलती रहती हैं और एक ही सभ्यता कभी अकर्मण्यता की और कभी गहन कर्मठता की ओर अग्रसर दिखाई देती है।

भारतीय परंपरा में किसी समय विधा और ज्ञान का दो धाराओं में विभाजन हुआ है। जो विधा इस नश्वर सतत परिवर्तनशील, लीलामयी सृष्टि से परे के सनातन ब्रह्म की बात करती है। उस ब्रह्म से साक्षात्कार का मार्ग दिखाती है वह परा विधा है। इसके विपरीत जो विधाएं इस सृष्टि के भीतर रहते हुए दैनंदिन की समस्याओं के समाधान का मार्ग बतलाती हैं। साधारण जीवन-यापन को संभव बनाती हैं। वे अपरा विधाएं है। और ऐसा माना जाता है कि परा विधा, अपरा विधाओं से ऊँची है।

अपरा के प्रति हेयता का भाव शायद भारतीय चित्त का मौलिक भाव नहीं है। मूल बात शायद अपरा की हीनता की नहीं थी। कहा शायद यह गया था कि अपरा में रमते हुए यह भूल नहीं जाना चाहिए कि इस नश्वर सृष्टि से परे सनातन सत्य भी कुछ है। इस सृष्टि में दैनिक जीवन के विभिन्न कार्य करते हुए परा के बारे में चेतन रहना चाहिए। अपरा का सर्वदा परा के आलोक में नियमन करते रहना चाहिए। अपरा विधा की विभिन्न मूल संहिताओं में कुछ ऐसा ही भाव छाया मिलता है। पर समय पाकर परा से अपरा के नियमन की यह बात अपरा की हेयता में बदल गई है। यह बदलाव कैसे हुआ इस पर तो विचार करना पडे़गा। भारतीय मानस व काल के अनुरूप परा और अपरा में सही संबंध क्या बैठता है, इसकी भी कुछ व्याख्या हमें करनी ही पड़ेगी।

पर यह ऊँच-नीच वाली बात तो बहुत मौलिक नहीं दिखती। पुराणों में इस बारे में चर्चा है। एक जगह ऋषि भारद्वाज कहते है कि यह ऊँच-नीच वाली बात कहां से आ गई? मनुष्य तो सब एक ही लगते है, वे अलग-अलग कैसे हो गए? महात्मा गाँधी भी यही कहा करते थे कि वर्णो में किसी को ऊँचा और किसी को नीचा मानना तो सही नहीं दिखता। 1920 के आस-पास उन्होंने इस विषय पर बहुत लिखा और कहा। पर इस विषय में हमारे विचारों का असंतुलन जा नहीं पाया। पिछले हजार दो हजार वर्षों में भी इस प्रश्न पर बहस रही होगी। लेकिन स्वस्थ वास्तविक जीवन में तो ऐसा असंतुलन चल नहीं पाता। वास्तविक जीवन के स्तर पर परा व अपरा के बीच की दूरी और ब्राह्मण व शूद्र के बीच की असमानता की बात भी कभी बहुत चल नहीं पाई होगी। मौलिक साहित्य के स्तर पर भी इतना असंतुलन शायद कभी न रहा हो। यह समस्या तो मुख्यत: समय-समय पर होने वाली व्याख्याओं की ही दिखाई देती है।

पुरूष सूक्त में यह अवश्य कहा गया है कि ब्रह्म के पांवों से शूद्र उत्पन्न हुए, उसकी जंघाओं से वैश्य आए, भुजाओं से क्षत्रिय आए और सिर से ब्राह्मण आए। इस सूक्त में ब्रãह्म और सृष्टि में एकरूपता की बात तो है। थोड़े में बात कहने का जो वैदिक ढंग है उससे यहाँ बता दिया गया है कि यह सृष्टि ब्रह्म का ही व्यास है, उसी की लीला है। सृष्टि में अनिवार्य विभिन्न कार्यो की बात भी इसमें आ गई है। पर इस सूक्त में यह तो कहीं नहीं आया कि शूद्र नीचे है और ब्राह्मण ऊँचे है। सिर का काम पांवों के काम से ऊँचा होता है। यह तो बाद की व्याख्या लगती है। यह व्याख्या तो उलट भी सकती है। पांवों पर ही तो पुरूष धरती पर खडा़ होता है। पांव टिकते हैं तो ऊपर धड़ भी आता है हाथ भी आते हैं। पांव ही नहीं टिकेंगें तो और भी कुछ नहीं आएगा। पुरूष सूक्त में यह भी नहीं है कि ये चारों वर्ण एक ही समय पर बने। पुराणों की व्याख्या से तो ऐसा लगता है कि आरंभ में सब एक ही वर्ण थे। बाद में काल के अनुसार जैसे-जैसे विभिन्न प्रकार की क्षमताओं की आवष्यकता होती गई, वैसे-वैसे वर्ण-विभाजित होते गए।

कर्म और कर्मफल के इस मौलिक सिद्धांत का इस विचार से तो कोई संबंध नहीं है कि कुछ कर्म अपने आप में निकृष्ट होता है और कुछ प्रकार के काम उत्तम। वेदों का उच्चारण करना ऊँचा काम होता है और कपडा़ बुनना नीचा काम, यह बात तो परा-अपरा वाले असंतुलन से ही निकल आई है। और इस बात की अपने यहाँ इतनी यांत्रिक-सी व्याख्या होने लगी है कि बड़े-बड़े विद्वान भी दरिद्रता, भुखमरी आदि जैसी सामाजिक अव्यवस्थाओं को कर्मफल के नाम पर डाल देते हैं। श्री ब्रह्मा नंद सरस्वती जैसे जोशीमठ के ऊँचे शंकराचार्य तक कह दिया करते थे कि दरिद्रता तो कर्मो की बात है। करूणा, दया, न्याय आदि जैसे भावों को भूल जाना तो कर्मफल के सिद्धांत का उद्देश्य नहीं हो सकता। यह तो सही व्याख्या नहीं दिखती।

कर्मफल के सिद्धांत का अर्थ तो शायद कुछ और ही है। क्योंकि कर्म तो सब बराबर ही होते हैं। लेकिन जिस भाव से, जिस तन्मयता से कोई कर्म किया जाता है वही उसे ऊँचा और नीचा बनाता है। वेदों का उच्चारण यदि मन लगाकर ध्यान से किया जाता है तो वह ऊँचा कर्म है। उसी तरह मन लगाकर ध्यान से खाना पकाया जाता है तो वह भी ऊँचा कर्म है। और भारत में तो ब्राह्मण लोग खाना बनाया ही करते थे। अब भी बनाते हैं। उनके वेदोच्चारण करने के कर्म में और खाना बनाने में बहुत अंतर है। पर वेदोच्चारण ऐसा किया जाए जैसे बेगार काटनी हो, या खाना ऐसे बनाया जाये जैसे सिर पर पड़ा कोई भार किसी तरह हटाना हो, तो दोनो की कर्म गडबड़ हो जाएंगे।

परा-अपरा और वर्ण व्यवस्था पर भी अनेक व्याख्याऐं होंगी। उन व्याख्याओं को देख-परखकर आज के संदर्भ में भारतीय मानव व काल की एक नई व्याख्या कर लेना ही विद्वता का उददेश्य हो सकता है। परंपरा का इस प्रकार नवीनीकरण करते रहना मानस को समयानुरूप व्यवहार का मार्ग दिखाते रहना ही हमेशा से ऋषियों, मुनियों और विद्वानों का काम कर रहा है।

*धर्मपाल एक विख्यात विचारक होने के साथ साथ गांधीवादी चिंतक भी हैं 

Thursday, June 25, 2020

स्व-सहायता समूह आदिवासी क्षेत्रों में भी सक्रिय हुए

गुरूवार जून 25, 2020, 19:00 IST
प्रवासी मजदूरों को इन्हीं के माध्यम से मिलेगा रोज़गार
भोपाल: 25 जून 2020: (मध्यप्रदेश स्क्रीन ब्यूरो)::
प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में प्रवासी आदिवासी मजदूरों और महिलाओं को स्व-सहायता समूह की गतिविधियों से जोड़कर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जाने के प्रयास किये जायेंगे। इसके लिये केन्द्रीय जनजातीय मंत्रालय ने प्रदेश की 65 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है। यह जानकारी प्रमुख सचिव, आदिम-जाति कल्याण श्रीमती पल्लवी जैन गोविल की अध्यक्षता में मंत्रालय में हुई बैठक में दी गई। प्रमुख सचिव ने विभिन्न जिलों के अधिकारियों से वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से चर्चा की। बैठक में संचालक, आदिवासी क्षेत्रीय विकास योजना सुश्री शैलबाला मॉर्टिन, ग्रामीण आजीविका मिशन, मेपसेट, कौशल विकास और बैंकर्स भी मौजूद थे।
प्रमुख सचिव, आदिम-जाति कल्याण श्रीमती गोविल ने बताया कि प्रदेश में रोजगार सेतु एप के माध्यम से प्रवासी मजदूरों के कौशल के अनुसार सर्वे किया गया है। इसके माध्यम से उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जायेंगे। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास किये जायें, जिससे प्रवासी मजदूरों और उनके परिवार को जल्द से जल्द आर्थिक लाभ मिलना शुरू हो जायें। प्रमुख सचिव ने बताया कि आदिवासी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में शैक्षणिक संस्थान हैं। इनमें होने वाली गतिविधियों से भी स्व-सहायता समूहों को जोड़ा जा सकता है।
बैठक में पशु एवं मत्स्य-पालन, पोल्ट्री फार्म, डेयरी से जुड़ी अन्य गतिविधियों, खाद्य प्र-संस्करण, रेशम और मधुमक्खी-पालन के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सृजित किये जाने पर चर्चा की गई। बैठक में बताया गया कि सीधी जिले में 31 हजार से अधिक प्रवासी श्रमिक जिले में लौटे हैं। धार जिले में करीब 34 हजार प्रवासी मजदूर जिले में लौटे हैं। इन्हें रोजगार से जोड़ने के लिये मनरेगा में सर्वे का कार्य किया गया है। आयुक्त, आदिम-जाति कल्याण श्री बी. चन्द्रशेखर ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में पूर्व में तैयार शेड का उपयोग इन गतिविधियों से जोड़ने के लिये किया जा सकता है। बैठक में जिला अधिकारियों को योजना के संबंध में प्रस्ताव देने के निर्देश दिये गये।

Saturday, May 23, 2020

मध्यप्रदेश में फिर से लोकप्रिय हो रहा है सागौन का उत्पादन

 कोई जवाब नहीं सागौन की मज़बूती और खूबसरती का 
इंदौर: 23 मई 2020: (मध्यप्रदेश स्क्रीन हिंदी डेस्क)::
कोरोना युग में जीवन शैलियाँ बदल रही हैं। अब जहां ज़िंदगी जहां नए रुख अख्तियार करेगी और उसे खूबसरत बनाने के नए अंदाज़ भी बाजार में निकलेंगे वहीँ जीवन यापन के ढंग तरीकों में भी तब्दीली आएगी। अब कृषि पहले जैसी न रहेगी। वन विभाग, इन्दौर की टिश्यू कल्चर लेब में आधुनिकतम तकनीक से सागौन के उच्च गुणवत्ता वाले जो पौधे तैयार किये जा रहे है उनके उत्पादन से तो यही संकेत मिलता है।  
आप जानते हैं न सागौन? यह टीकवुड द्विबीजपत्री पौधा है। हराभरा पर्यावरण चाहते हैं तो सागौन से दोस्ती कीजिये। यकीन मानिये मन भी हराभरा ही रहेगा। यह चिरहरित यानि वर्ष भर हरा-भरा रहने वाला पौधा है। इनके क्षेत्र में या इनके आसपास रहने से माहौल हराभरा रहेगा ही। यह काफी लम्बा चौड़ा होता है। सागौन का वृक्ष प्रायः 80 से 100 फुट लम्बा होता है। कभी कभी से ज़्यादा भी हो सकता है। इसका वृक्ष काष्ठीय होता है। इसकी लकड़ी हल्की, मजबूत और काफी समय तक चलनेवाली होती है। इसलिए मज़बूती के मामले में भी सका कोई जवाब नहीं होता। इसके पत्ते काफी बड़े बड़े होते हैं।  साथ ही फूल उभयलिंगी और सम्पूर्ण होते हैं। हर काल में लगातार लोक प्रिय बने रहे सागौन का वानस्पतिक नाम टेक्टोना ग्रैंडिस (Tectona grandis) यह बहुमूल्य इमारती लकड़ी है। सदियों से इसके इस्तेमाल को पहल दी जाती है। इसका इतिहास भी काफी लम्बा है। 
सागौन को संस्कृत में 'शाक' कहा जाता है।  लगभग दो सहस्र वर्षों से भारत में यह ज्ञात है और अधिकता से व्यवहृत होती आ रही है। वर्बीनैसी (Verbenaceae) कुल का यह वृहत्‌, पर्णपाती वृक्ष है। यह शाखा और शिखर पर ताज ऐसा चारों तरफ फैला हुआ होता है। भारत, बरमा और थाइलैंड का यह देशज है, पर फिलिपाइन द्वीप, जावा और मलाया प्रायद्वीप में भी बहुतायत में पाया जाता है। भारत में अरावली पहाड़ में पश्चिम में पूर्वी देशांतर अर्थात  झांसी तक में भी पाया जाता है। इसकी लोकप्रियता का अनुमान यहाँ से लगाइये कि असम और पंजाब में भी यह सफलता से उगाया गया है। साल में 50 इंच से अधिक वर्षा वाले और25° से 27° सें. ताप वाले स्थानों में यह अच्छा उपजता है। इसके लिए तीन हज़ार फुट की ऊँचाई के जंगल अधिक उपयुक्त हैं। इससे इसे बहता हुआ पानी आसानी से दिया जा सकता है। खासियत यह भी कि सब प्रकार की मिट्टी में यह उपज सकता है पर पानी का निकास रहना अथवा अधोभूमि का सूखा रहना आवश्यक है। गरमी में इसकी पत्तियाँ अक्सर ही  झड़ जाती हैं। गरम स्थानों में जनवरी में ही पत्तियाँ गिरने लगती हैं पर अधिकांश स्थानों में मार्च तक पत्तियाँ हरी रहती हैं। पत्तियाँ एक से दो फुट लंबी और 6 से 12 इंच चौड़ी होती है। इसका लच्छेदार फूल सफेद या कुछ नीलापन लिए सफेद होता है और बहुत ही सुंदर लगता है। इसके बीज गोलाकार होते हैं और पक जाने पर गिर पड़ते हैं। बीज में तेल रहता है। बीज बहुत धीरे-धीरे अँकुरते हैं। पेड़ साधारणतया 100 से  150 फुट ऊँचे और धड़ 3 से 8 फुट व्यास के होते हैं। डोर से देखो तो इनका कद एक अलग किस्म की दिव्य भव्यता का निर्माण करता महसूस होता है।  
इसकी औषधीय खूबियां भी बहुत हैं। इसके धड़ की छाल आधा इंच मोटी, धूसर या भूरे रंग की होती है। इनका रसकाष्ठ सफेद और अंत:काष्ठ हरे रंग का होता है। अंत:काष्ठ की गंध सुहावनी और प्रबल सौरभ वाली होती है। गंध बहुत दिनों तक कायम रहती है। इसकी छाल और फूल दोनों ही विभिन्न दवाएं बनाने के काम आते हैं। 
सागौन की लकड़ी बहुत अल्प सिकुड़ती और बहुत मजबूत होती है। इस पर पॉलिश जल्द चढ़ जाती है जिससे यह बहुत आकर्षक हो जाती है। कई सौ वर्ष पुरानी इमारतों में यह ज्यों की त्यों पाई गई है। दो सहस्र वर्षों के पश्चात्‌ भी सागौन की लकड़ी अच्छी अवस्था में पाई गई है। सागौन के अंत:काष्ठ को दीमक आक्रांत नहीं करती यद्यपि रसकाष्ठ को खा जाती है।
सागौन उत्कृष्ट कोटि के जहाजों, नावों, बोंगियों इत्यादि भवनों की खिड़कियों और चौखटों, रेल के डिब्बों और उत्कृष्ट कोटि के फर्नीचर के निर्माण में प्रधानतया प्रयुक्त होता है।
अच्छी भूमि पर दो वर्ष पुराने पौद (sudling), जो ५ से १० फुट ऊँचे होते हैं, लगाए जाते हैं और लगभग 60 वर्षों में यह औसत 60  फुट का हो जाता है और इसके धड़ का व्यास डेढ़ से दो फुट का हो सकता है। अब इसे जलवायु का ही प्रभाव कहा जा सकता है कि बरमा में 80 वर्ष की उम्र के सागौन पेड़ का घेरा 2 फुट व्यास का हो जाता है, यद्यपि भारत में इतना मोटा होने में 200 वर्ष लग सकते हैं। भारत के ट्रावनकोर, कोचीन, मद्रास, कुर्ग, मैसूर, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के जंगलों के सागौन की उत्कृष्ट लकड़ियाँ अधिकांश बाहर चली जाती हैं। बरमा का सागौन पहले पर्याप्त मात्रा में भारत आता था पर अब वहाँ से ही बाहर चला जाता है। थाईलैंड की लकड़ी भी पाश्चात्य देशों को चली जाती है हालांकि इसकी मांग भारत में कम नहीं है लेकिन विदेश से अधिक धन मिल जाता है। अब इसकी पैदावार बढ़ाने पर भी तीव्रता से विचार हो रहा है। 

Monday, May 4, 2020

मदिरा एवं भांग दुकानों के संचालन की 5 मई से नई व्यवस्था

Monday: 4th May 2020 at 15:34 IST
 भोपाल, इंदौर एवं उज्जैन जिलों में बंद रहेगी मदिरा एवं भांग की बिक्री 
भोपाल: सोमवार: 4 मई  2020: (मीडिया लिंक रविन्द्र//मध्यप्रदेश स्क्रीन):: 
कोरोना को नज़र में रख कर बनाई गयी नयी व्यवस्था  
कोरोना भी बढ़ रहा है और नशे की तलब भी। हालांकि शराब इत्यादि से सरकारों को काफी आमदनी होती है इसके बावजूद राज्य की सरकार ने इसकी बिक्री की आज्ञा सभी जगहों पर नहीं दी। इसके लिए बाकायदा एक विशेष चार्ट जारी किया गया है जो कोरोना की रफ्तार को नजर में रखते हुए बना गया है। 
राज्य शासन ने प्रदेश में नोवल कोरोना वायरस संक्रमण के कारण मदिरा एवं भांग दुकानों के संचालन की जोनवार वर्गीकृत जिलों में नई व्यवस्था 5 मई से लागू की है।
नई व्यवस्था के मुताबिक प्रदेश में रेड जोन में आने वाले भोपाल, इंदौर एवं उज्जैन जिलों में मदिरा एवं भांग की समस्त दुकानें आगामी आदेश तक बंद रहेंगी। रेड जोन के अन्य जिलों जबलपुर, धार, बड़वानी, पूर्वी निमाड़(खण्डवा), देवास एवं ग्वालियर जिलों के मुख्यालय की शहरी क्षेत्रों की दुकानों को छोड़कर अन्य क्षेत्रों की मदिरा एवं भांग की दुकानें संचालित की जाएंगी। ऑरेंज जोन के अंतर्गत आने वाले खरगौन, रायसेन, होशंगाबाद, रतलाम, आगर-मालवा, मंदसौर, सागर, शाजापुर, छिन्दवाड़ा, अलीराजपुर, टीकमगढ़, शहडोल, श्योपुर, डिण्डौरी, बुरहानपुर, हरदा, बैतूल, विदिशा, मुरैना एवं रीवा के कंटेनमेंट एरिया को छोड़कर शेष मदिरा एवं भांग दुकानें संचालित की जाएंगी। ग्रीन जोन के अंतर्गत आने वाले जिलों की सभी मदिरा एवं भांग दुकानों का संचालन प्रारंभ किया जाएगा।
सभी लायसेंसियों को निर्देशित किया गया है कि वे दुकानों पर गृह मंत्रालय, भारत सरकार तथा वाणिज्यिक कर विभाग मध्यप्रदेश शासन द्वारा जारी एसओपी और दो गज की दूरी का पालन भी सुनिश्चित करें।

Sunday, May 3, 2020

श्रमिकों की वापसी के लिए 31 रेलगाड़ियों की मांग

Sunday: 3rd May 2020 at 18:39 IST
अब तक 59 हजार श्रमिकों की वापसी 
भोपाल: रविवार, मई 3, 2020, 18:39 IST: (मध्यप्रदेश स्क्रीन)::
कोरोना संक्रमण के कारण अन्य प्रदेशों में फंसे मध्यप्रदेश के श्रमिकों की वापसी का क्रम लगातार जारी है। अब तक 59000 श्रमिक प्रदेश में वापस लाए जा चुके हैं। विभिन्न प्रदेशों में फँसे श्रमिकों को वापस लाने के लिए रेल मंत्रालय से 31 ट्रेनों की मांग की गई है।
 अपर मुख्य सचिव और प्रभारी स्टेट कंट्रोल रूम श्री आई.सी.पी. केसरी ने जानकारी दी है कि आज गुजरात से लगभग 4000 श्रमिक वापस लाए गए। प्रदेश के विभिन्न जिलों में फँसे प्रदेश के करीब 42000 श्रमिकों को पिछले 8 दिनों में उनके ग्रह स्थान पहुँचाया गया है। तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक आदि राज्यों से श्रमिकों को वापस लाने के लिए चर्चाएँ जारी हैं। महाराष्ट्र, गोवा, हरियाणा और गुजरात के लिए ट्रेन मूवमेंट एवं रूट की जानकारी तैयार की जा रही है। रेल मंत्रालय और संबंधित राज्यों को रेलगाड़ियों के लिए मांग पत्र भेजा गया है।

Saturday, April 25, 2020

क्रिश्चियन समाज की सिस्टर्स बना रहीं मास्क

Saturday: 25th April 2020 at 18:17 IST
स्थानीय मनो-विकास समर्थ सेंटर में दीखता है मानवता से प्रेम का दृश्य 
भोपाल: शनिवार 25 अप्रैल 2020: (मीडिया लिंक//मध्यप्रदेश स्क्रीन)::
उज्जैन में क्रिश्चियन समाज की सिस्टर्स मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों की देखभाल करने के साथ-साथ मास्क बनाने और जरूरतमंदों तक मास्क पहुंचाने का काम कर रही हैं। स्थानीय मनो-विकास समर्थ सेंटर में  रहने वाले 8-10 मानसिक दिव्यांग बच्चे  लॉकडाउन के कारण अपने घर नही जा सके हैं। समर्थ सेंटर, पुष्पा मिशन हॉस्पिटल, सेंट मेरी कॉन्वेंट स्कूल आदि में  सेवारत  सिस्टर्स ने इस बच्चों की देखभाल करते हुए अभी तक 1000 से अधिक मास्क बनाये हैं।
सिस्टर्स द्वारा बनाये गए मास्क बिशप सेबास्टियन वडकेल ने पुलिस विभाग के अधिकारियों को सौपे हैं। क्रिश्चियन समाज इस सेवा कार्य के साथ ही जरूरतमंद गरीब परिवारों को खाद्यान्न सामग्री भी वितरित कर रहा है। बिशप वड़क्केल ने बताया कि समाज की कृपा वेलफेयर सोसायटी, मध्यप्रदेश विकलांग सहायता समिति एवं निर्मला चर्च चंदेस्सेरी की सिस्टर्स ने इस काम में  भरपूर योगदान दिया है।  सर्वधर्म समभाव की भावना के साथ संकट की इस घड़ी में उज्जैन धर्मप्रान्त के क्रिश्चियन समाज का यह योगदान शहर के लिये मिसाल बन गया है।