Saturday, October 31, 2020

राष्ट्रीय एकता दिवस के उपलक्ष में आयोजित मार्चपास्ट

 देशभक्ति गीतों की धुनों से बना विशेष माहौल 


सागर
: 31 अक्टूबर 2020: (मध्य प्रदेश स्क्रीन ब्यूरो)::

सरदार बल्लभ भाई पटेल की जयंती के अवसर पर शनिवार को स्थानीय पुलिस प्रशिक्षण मैदान में राज्य पुलिस और अन्य वर्दीधारी बलों तथा अन्य एजेन्सियों द्वारा भव्य मार्चपास्ट का आयोजन किया गया। जिसमें देशभक्ति गानों की धुनें प्रस्तुत की गई। इस अवसर पर कलेक्टर श्री दीपक सिंह, पुलिस अधीक्षक श्री अतुल सिंह, नगर निगम कमिश्नर श्री आरपी अहिरवार नगर दण्डाधिकारी श्री प्रकाश नायक, डीआईजी श्री वर्मा, उपायुक्त डॉ. प्रणय कमल खरे सहित अन्य अधिकारी कर्मचारी मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन श्री अरविन्द जैन ने किया।  

Saturday, October 24, 2020

यह बीसवीं-इक्कीसवीं सदी है किसकी !!

 Friday: 23rd  October 2020 at 13:12 IST

  विख्यात गांधीवादी चिंतक और इतिहासकार धर्मपाल की पुण्यतिथि 24 अक्टूबर पर विशेष आलेख  


भोपाल
: 23 अक्टूबर 2020: (मध्यप्रदेश स्क्रीन ब्यूरो)::

पृथ्वी के कष्टों का निवारण करने के लिए अवतार-पुरूष जन्म लिया करते हैं, यह मान्यता भारतवर्ष में अत्यन्त प्राचीन समय से चली आ रही है। इसलिए 1915 में भारत के लोगों ने सहज ही यह मान लिया कि भगवान ने उनका दु:ख समझ लिया है और उस दु:ख को दूर करने के लिए व भारतीय जीवन में एक नया संतुलन लाने के लिए महात्मा गाँधी को भेजा गया है। गाँधीजी के प्रयासों से भारतीय सभ्यता की दास्तान का दु:ख बहुत कुछ कट ही गया, लेकिन भारतीय जीवन में कोई संतुलन नहीं आ पाया। गाँधीजी 1948 के बाद जीवित रहते तो भी इस नए संतुलन के लिए तो कुछ और ही प्रयत्न करने पड़ते।

जो काम महात्मा गाँधी पूरा नहीं कर पाए उसे पूरा करने के प्रयास हमें आगे-पीछे तो आरंभ करने ही पड़ेंगे। आधुनिक विश्व में भारतीय जीवन के लिए भारतीय मानव व काल के अनुरूप कोई नया संतुलन ढूँढें बिना तो इस देश का बोझ हल्का नहीं हो पाएगा और उस नए ठोस धरातल को ढूँढने का मार्ग वही है जो महात्मा गांधी का था। इस देश के साधारणजन के मानस में पैठकर, उसके चित्त व काल को समझकर ही, इस देश के बारे में कुछ सोचा जा सकता है।

पर शायद हमें यह आभास भी है कि भारतीय चित्त वैसा साफ-सपाट नहीं है जैसा मानकर हम चलना चाहते हैं। वास्तव में तो वह सब विषयों पर सब प्रकार के विचारों से अटा पडा़ है और वे विचार कोई नए नहीं हैं। वे सब पुराने ही है। शायद ऋग्वेद के समय से वे चले आ रहे है या शायद गौतम बुद्ध के समय से कुछ विचार उपजे होंगे या फिर महावीर के समय से। पर जो भी ये विचार है जहां से भी वे आए हैं वे भारतीय मानस में बहुत गहरे बैठे हुए हैं। और शायद हम यह बात जानते हैं। लेकिन हम इस वास्तविकता को समझना नहीं चाहते। इसे किसी तरह नकार कर भारतीय मानस व चित्त की सभी वृत्तियों से आंखे मूंदकर अपने लिए कोई एक नई दुनिया हम गढ़ लेना चाहते हैं।

इसलिए अपने मानस को समझने की सभी कोशिशें हमें बेकार लगती हैं। अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के भारत के इतिहास का मेरा अध्ययन भी भारतीय मानस को समझने का एक प्रयास ही था। उस अध्ययन से अंग्रेजों के आने से पहले के भारतीय राज-समाज की भारत के लोगों के सहज तौर-तरीकों की एक समझ तो बनी। समाज की जो भौतिक व्यवस्थाएं होती है, विभिन्न तकनीकें होती है, रोजमर्रा का काम चलाने के जो तरीके होते हैं, उनका एक प्रारूप-सा तो बना पर समाज के अंतर्मन की उसके मानस की चित्त की कोई ठीक पकड़ उस काम से नहीं बन पाई। मानस को पकड़ने का, चित्त को समझने का मार्ग शायद अलग होता है।

हममें से कुछ लोग शायद मानते हों कि वे स्वयं भारतीय मानस, चित्त व काल की सीमाओं से सर्वथा मुक्त हो चुके हैं। अपनी भारतीयता को लाँघकर वे पश्चिमी आधुनिकता या शायद किसी प्रकार की आदर्श मानवता के साथ एकात्म हो गए है। ऐसे कोई लोग है तो उनके लिए बीसवीं सदी की दृष्टि से कलियुग को समझना और भारतीय कलियुग को पश्चिम की बीसवीं सदी के रूप में ढालने के उपायों पर विचार करना संभव होता होगा, पर ऐसा अक्सर हुआ नहीं करता। अपने स्वाभाविक देश-काल की सीमाओं-मर्यादाओं से निकालकर किसी और के युग में प्रवेश कर जाना असाधारण लोगों के बस की भी बात नहीं होती। जवाहरलाल नेहरू जैसों से भी नहीं हो पाया होगा। अपनी सहज भारतीयता से पूरी तरह मुक्त वे भी नहीं हो पाए होंगें। महात्मा गाँधी के कहने के अनुसार भारत के लोगों में जो एक तर्कातीत और विचित्र-सा भाव है, उस विचित्र तर्कातीत भाव का शिकार होने से जवाहरलाल नेहरू भी नहीं बच पाए होगें फिर बाकी लोगों की तो बात ही क्या। वे तो भारतीय मानस की मर्यादाओं से बहुत दूर जा ही नहीं पाते होंगे।

भारत के बड़े लोगों ने आधुनिकता का एक बाहरी आवरण सा जरूर ओढ़ रखा है। पश्चिम के कुछ संस्कार भी शायद उनमें आए है। पर चित्त के स्तर पर वे अपने को भारतीयता से अलग कर पाए हो, ऐसा तो नहीं लगता। हां, हो सकता है कि पश्चिमी सभ्यता के साथ अपने लंबे और घनिष्ठ संबंध के चलते कुछ दस-बीस-पचास हजार, या शायद लाखों लोग, भारतीयता से बिल्कुल दूर हट गए हों। पर यह देश तो दस-बीस-पचास हजार या लाख लोगों का नहीं है। यह तो 125 करोड़ अस्सी करोड़ लोगों की कथा है।

भारतीयता की मर्यादाओं से मुक्त हुए ये लाखों आदमी जाना चाहेंगें तो यहाँ से चले ही जाएँगे। देश अपनी अस्मिता के हिसाब से अपने मानस, चित्त व काल के अनुरूप चलने लगेगा तो हो सकता है इनमें से भी बहुतेरे फिर अपने सहज चित्त-मानस में लौट आएँ। जिनका भारतीयता से नाता पूरा टूट चुका है, वे तो बाहर कही भी जाकर बस सकते हैं। जापान वाले जगह देंगे तो वहाँ जाकर रहने लगेंगे। जर्मनी में जगह हुई जर्मनी में रह लेंगे। रूस में कोई सुंदर जगह मिली तो वहाँ चले जाएंगे। अमेरिका में तो वे अब भी जाते ही हैं। दो-चार लाख भारतीय अमेरिका जाकर बसे ही हैं और उनमें बड़े-बड़े इंजीनियर, डॉक्टर, दार्शनिक, साहित्यकार, विज्ञानविद् और अन्य प्रकार के विद्वान भी शामिल है। पर इन लोगों का जाना कोई बहुत मुसीबत की बात नहीं है। समस्या उन लोगों की नहीं जो भारतीय चित्त व काल से टूटकर अलग जा बसे है। समस्या तो उन करोड़ों लोगों की है जो अपने स्वाभाविक मानस व चित्त के साथ जुड़कर अपने सहज काल में रह रहे है। इन लोगों के बल पर देश को कुछ बनाना है तो हमें उस सहज चित्त, मानस व काल को समझना पडे़गा।

भारतीय वर्तमान के धरातल से पश्चिम की बीसवीं सदी का क्या रूप दिखता है, उस बीसवीं सदी और अपने कलियुग में कैसा और क्या संपर्क हो सकता है, इस सब पर विचार करना पडे़गा। यह तभी हो सकता है जब हम अपने चित्त व काल को, अपनी कल्पनाओं व प्राथमिकताओं को और अपने सोचने-समझने व जीने के तौर-तरीकों को ठीक से समझ लेंगे।

(संदर्भ - धर्मपाल समग्र लेखन भाग-1 से साभार)


Thursday, October 22, 2020

हम किसी और के संसार में रहने लगे है ....

Thursday: 22nd October 2020, 14:41 IST 

जनसाधारण की भागीदारी  से ही सम्भव है असली  विकास प्रक्रिया   


भोपाल:  22 अक्टूबर 2020: (*धर्मपाल//मध्यप्रदेश स्क्रीन)::

भारतीय मानस में सृष्टि के विकास के क्रम और उसमें मानवीय प्रयत्न और मानवीय ज्ञान-विज्ञान के स्थान की जो छवि अंकित है, वह आधुनिकता से इस प्रकार विपरीत है तो इस विषय पर गहन चिंतन करना पड़ेगा। यहां के तंत्र हम बनाना चाहते हैं और जिस विकास प्रक्रिया को यहां आरंभ करना चाहते हैं, वह तो तभी यहां जड़ पकड़ पाएगी और उसमें जनसाधारण की भागीदारी तो तभी हो पायेगी जब वह तंत्र और विकास प्रक्रिया भारतीय मानस और काल दृष्टि के अनुकूल होगी। इसलिए इस बात पर भी विचार करना पडे़गा कि व्यवहार में भारतीय मानस पर छाए विचारों और काल की भारतीय समझ के क्या अर्थ निकलते है? किस प्रकार के व्यवहार और व्यवस्थाएं उस मानस व काल में सही जँचते हैं? सम्भवत: ऐसा माना जाता है कि मानवीय जीवन और मानवीय ज्ञान की क्षुद्रता का जो भाव भारतीय सृष्टि-गाथा में स्पष्ट झलकता है, वह केवल अकर्मण्यता को ही जन्म दे सकता है पर यह तो बहुत सही बात है। किसी भी विश्व व काल दृष्टि का व्यवाहारिक पक्ष तो समय सापेक्ष होता है। अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग समय पर उस दृष्टि की अलग-अलग व्याख्याएं होती जाती हैं। इन व्याख्याओं से मूल चेतना नहीं बदलती पर व्यवहार और व्यवस्थाएं बदलती रहती हैं और एक ही सभ्यता कभी अकर्मण्यता की और कभी गहन कर्मठता की ओर अग्रसर दिखाई देती है।

भारतीय परंपरा में किसी समय विधा और ज्ञान का दो धाराओं में विभाजन हुआ है। जो विधा इस नश्वर सतत परिवर्तनशील, लीलामयी सृष्टि से परे के सनातन ब्रह्म की बात करती है। उस ब्रह्म से साक्षात्कार का मार्ग दिखाती है वह परा विधा है। इसके विपरीत जो विधाएं इस सृष्टि के भीतर रहते हुए दैनंदिन की समस्याओं के समाधान का मार्ग बतलाती हैं। साधारण जीवन-यापन को संभव बनाती हैं। वे अपरा विधाएं है। और ऐसा माना जाता है कि परा विधा, अपरा विधाओं से ऊँची है।

अपरा के प्रति हेयता का भाव शायद भारतीय चित्त का मौलिक भाव नहीं है। मूल बात शायद अपरा की हीनता की नहीं थी। कहा शायद यह गया था कि अपरा में रमते हुए यह भूल नहीं जाना चाहिए कि इस नश्वर सृष्टि से परे सनातन सत्य भी कुछ है। इस सृष्टि में दैनिक जीवन के विभिन्न कार्य करते हुए परा के बारे में चेतन रहना चाहिए। अपरा का सर्वदा परा के आलोक में नियमन करते रहना चाहिए। अपरा विधा की विभिन्न मूल संहिताओं में कुछ ऐसा ही भाव छाया मिलता है। पर समय पाकर परा से अपरा के नियमन की यह बात अपरा की हेयता में बदल गई है। यह बदलाव कैसे हुआ इस पर तो विचार करना पडे़गा। भारतीय मानस व काल के अनुरूप परा और अपरा में सही संबंध क्या बैठता है, इसकी भी कुछ व्याख्या हमें करनी ही पड़ेगी।

पर यह ऊँच-नीच वाली बात तो बहुत मौलिक नहीं दिखती। पुराणों में इस बारे में चर्चा है। एक जगह ऋषि भारद्वाज कहते है कि यह ऊँच-नीच वाली बात कहां से आ गई? मनुष्य तो सब एक ही लगते है, वे अलग-अलग कैसे हो गए? महात्मा गाँधी भी यही कहा करते थे कि वर्णो में किसी को ऊँचा और किसी को नीचा मानना तो सही नहीं दिखता। 1920 के आस-पास उन्होंने इस विषय पर बहुत लिखा और कहा। पर इस विषय में हमारे विचारों का असंतुलन जा नहीं पाया। पिछले हजार दो हजार वर्षों में भी इस प्रश्न पर बहस रही होगी। लेकिन स्वस्थ वास्तविक जीवन में तो ऐसा असंतुलन चल नहीं पाता। वास्तविक जीवन के स्तर पर परा व अपरा के बीच की दूरी और ब्राह्मण व शूद्र के बीच की असमानता की बात भी कभी बहुत चल नहीं पाई होगी। मौलिक साहित्य के स्तर पर भी इतना असंतुलन शायद कभी न रहा हो। यह समस्या तो मुख्यत: समय-समय पर होने वाली व्याख्याओं की ही दिखाई देती है।

पुरूष सूक्त में यह अवश्य कहा गया है कि ब्रह्म के पांवों से शूद्र उत्पन्न हुए, उसकी जंघाओं से वैश्य आए, भुजाओं से क्षत्रिय आए और सिर से ब्राह्मण आए। इस सूक्त में ब्रãह्म और सृष्टि में एकरूपता की बात तो है। थोड़े में बात कहने का जो वैदिक ढंग है उससे यहाँ बता दिया गया है कि यह सृष्टि ब्रह्म का ही व्यास है, उसी की लीला है। सृष्टि में अनिवार्य विभिन्न कार्यो की बात भी इसमें आ गई है। पर इस सूक्त में यह तो कहीं नहीं आया कि शूद्र नीचे है और ब्राह्मण ऊँचे है। सिर का काम पांवों के काम से ऊँचा होता है। यह तो बाद की व्याख्या लगती है। यह व्याख्या तो उलट भी सकती है। पांवों पर ही तो पुरूष धरती पर खडा़ होता है। पांव टिकते हैं तो ऊपर धड़ भी आता है हाथ भी आते हैं। पांव ही नहीं टिकेंगें तो और भी कुछ नहीं आएगा। पुरूष सूक्त में यह भी नहीं है कि ये चारों वर्ण एक ही समय पर बने। पुराणों की व्याख्या से तो ऐसा लगता है कि आरंभ में सब एक ही वर्ण थे। बाद में काल के अनुसार जैसे-जैसे विभिन्न प्रकार की क्षमताओं की आवष्यकता होती गई, वैसे-वैसे वर्ण-विभाजित होते गए।

कर्म और कर्मफल के इस मौलिक सिद्धांत का इस विचार से तो कोई संबंध नहीं है कि कुछ कर्म अपने आप में निकृष्ट होता है और कुछ प्रकार के काम उत्तम। वेदों का उच्चारण करना ऊँचा काम होता है और कपडा़ बुनना नीचा काम, यह बात तो परा-अपरा वाले असंतुलन से ही निकल आई है। और इस बात की अपने यहाँ इतनी यांत्रिक-सी व्याख्या होने लगी है कि बड़े-बड़े विद्वान भी दरिद्रता, भुखमरी आदि जैसी सामाजिक अव्यवस्थाओं को कर्मफल के नाम पर डाल देते हैं। श्री ब्रह्मा नंद सरस्वती जैसे जोशीमठ के ऊँचे शंकराचार्य तक कह दिया करते थे कि दरिद्रता तो कर्मो की बात है। करूणा, दया, न्याय आदि जैसे भावों को भूल जाना तो कर्मफल के सिद्धांत का उद्देश्य नहीं हो सकता। यह तो सही व्याख्या नहीं दिखती।

कर्मफल के सिद्धांत का अर्थ तो शायद कुछ और ही है। क्योंकि कर्म तो सब बराबर ही होते हैं। लेकिन जिस भाव से, जिस तन्मयता से कोई कर्म किया जाता है वही उसे ऊँचा और नीचा बनाता है। वेदों का उच्चारण यदि मन लगाकर ध्यान से किया जाता है तो वह ऊँचा कर्म है। उसी तरह मन लगाकर ध्यान से खाना पकाया जाता है तो वह भी ऊँचा कर्म है। और भारत में तो ब्राह्मण लोग खाना बनाया ही करते थे। अब भी बनाते हैं। उनके वेदोच्चारण करने के कर्म में और खाना बनाने में बहुत अंतर है। पर वेदोच्चारण ऐसा किया जाए जैसे बेगार काटनी हो, या खाना ऐसे बनाया जाये जैसे सिर पर पड़ा कोई भार किसी तरह हटाना हो, तो दोनो की कर्म गडबड़ हो जाएंगे।

परा-अपरा और वर्ण व्यवस्था पर भी अनेक व्याख्याऐं होंगी। उन व्याख्याओं को देख-परखकर आज के संदर्भ में भारतीय मानव व काल की एक नई व्याख्या कर लेना ही विद्वता का उददेश्य हो सकता है। परंपरा का इस प्रकार नवीनीकरण करते रहना मानस को समयानुरूप व्यवहार का मार्ग दिखाते रहना ही हमेशा से ऋषियों, मुनियों और विद्वानों का काम कर रहा है।

*धर्मपाल एक विख्यात विचारक होने के साथ साथ गांधीवादी चिंतक भी हैं 

Monday, August 31, 2020

मुख्यमंत्री श्री चौहान ने दूसरे दिन भी किया हवाई निरीक्षण

Bhopal: Sunday: 30th August 2020 at15:53 IST
 होशंगाबाद, सीहोर, रायसेन, देवास, हरदा और विदिशा जिलों के जलमग्न क्षेत्र का लिया जायजा 
भोपाल: रविवार: 30 अगस्त 2020: (मध्यप्रदेश स्क्रीन ब्यूरो)::
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का हेलीकाप्टर से निरीक्षण किया। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने आज दूसरे दिन पुन: प्रदेश के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का जायजा लिया। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कल जहां होशंगाबाद, सीहोर, रायसेन के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र देखे थे, वहीं आज फिर से होशंगाबाद, सीहोर और रायसेन जिलों के साथ ही देवास, हरदा और विदिशा जिले के जलमग्न क्षेत्रों को देखा।
कलेक्टर्स से ली विस्तृत जानकारी
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने संबंधित जिला कलेक्टर्स से दूरभाष पर चर्चा कर प्रभावित क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति, प्रभावित जनसंख्या, कोई जनधन क्षति यदि हुई हो और मवेशियों, फसलों एवं अन्न भण्डार की सुरक्षा के संबंध में विस्तार से जानकारी प्राप्त की। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने आज प्रात: मुख्यमंत्री निवास में उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक कर पूरे प्रदेश में अतिवर्षा से जनजीवन पर पड़े प्रभाव और राहत कार्यों के संबंध में जानकारी प्राप्त की। मुख्यमंत्री श्री चौहान इसके पश्चात छह जिलों के बाढ़ प्रभावित इलाकों के हेलीकाप्टर द्वारा निरीक्षण के लिए रवाना हुए।
आपदा प्रबंधन दल सक्रिय हैं, जनता भी सावधान रहे
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कलेक्टर्स को निर्देश दिए हैं कि वे संकट की इस स्थिति में प्रभावित लोगों की पूरी सहायता के लिए सक्रिय रहें। निचली बस्तियों में पानी के भराव की स्थिति को देखते हुए समय रहते नागरिकों को अन्य स्थानों पर शिफ्ट किया जाए। नियंत्रण कक्ष सक्रियता से कार्य करें। जहां आवश्यक हो तत्काल पुलिस, होमगार्ड, सेना और आपदा प्रबंधन दल की सहायता प्राप्त की जाए। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने सभी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में किए गए सुरक्षा प्रबंधनों की जानकारी भी प्राप्त की। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि आपात स्थिति से निपटने के लिए गोताखोर, बोट, हेलीकाप्टर आदि के पुख्ता इंतजाम हैं। जिन क्षेत्रों में सड़कों पर पुल-पुलियों पर बाढ़ का पानी है, उसे पार करने का प्रयास न किया जाए। जनता स्वयं भी सावधान रहे और पिकनिक स्थलों पर जाने से भी लोग बचें। बांधों का जलस्तर बढ़ने से गेट खोलने की सूचना दी जाती है लेकिन बहुत से लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते। आम नागरिकों की सहायता के लिए राज्य सरकार तत्पर है। लेकिन आमजन का सजग रहना बहुत आवश्यक है। जिलों में पदस्थ आपदा प्रबंधन दल हर तरह के संकट में लोगों की सहायता के लिए तैयार हैं।

Sunday, August 30, 2020

CM चौहान ने बाढ़ वाले गणेशजी से बाढ़ उतरने की प्रार्थना की

Bhopal: Sunday: 30th  August 2020 at 20:54 IST
विदिशा पहुँचकर सपत्नीक पूजा-अर्चना की
*निवास पर भी प्रतिदिन सपरिवार करते हैं श्री गणेश पूजन
*पत्नी श्रीमती साधना सिंह ने निवास पर सजाई हैं विशेष गणेश झाकियां
भोपाल: 30 अगस्त 2020: (मध्यप्रदेश स्क्रीन ब्यूरो)::
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान आज बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के हवाई सर्वे के दौरान विदिशा पहुंचे तथा वहां 'बाढ़ वाले गणेश मंदिर' पहुंचकर पत्नी श्रीमती साधना सिंह सहित विघ्न विनाशक मंगलकारी श्री गणेशजी की पूजा-अर्चना की। श्री चौहान ने गणेशजी से प्रार्थना की कि प्रदेश में बाढ़ जल्दी उतरे तथा हर व्यक्ति सुरक्षित रहे। श्री गणेश बाढ़ सहित प्रदेश पर आए हर संकट को दूर करें तथा सभी का मंगल करें। श्री चौहान ने मंदिर पर आयोजित भंडारे में सर्वप्रथम सपत्नीक कन्याओं का पूजन किया तथा उन्हें भोजन कराया। इसके बाद स्वयं सपत्नीक प्रसाद ग्रहण किया।
मुख्यमंत्री श्री चौहान प्रतिदिन अपने निवास पर विराजित श्री गणेशजी का सपरिवार पूजन करते हैं। गणेश उत्सव के दौरान मुख्यमंत्री की पत्नी श्रीमती साधना सिंह द्वारा मुख्यमंत्री निवास में भगवान श्री गणेश की विशेष झांकियां सजाई गई हैं। इन झांकियों में शिव बारात, शिव पार्वती विवाह, भगवान गणेश द्वारा शिव परिक्रमा, शिव पार्वती परिवार सहित आदि सजाई गई हैं। मुख्यमंत्री की पत्नी श्रीमती साधना सिंह  विगत अनेक वर्षों से गणेश उत्सव के दौरान भगवान गणपति के लिए छप्पन भोग का प्रसाद अपने हाथों से बनाकर लगाती हैं।
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने आज भी अपने पूरे परिवार के साथ निवास पर विराजित भगवान श्री गणेश का पूरे विधि विधान के साथ पूजन-अर्चन किया तथा प्रार्थना की कि प्रदेश में आई बाढ़ और कोरोना संकट  को शीघ्र समाप्त करें, प्रदेश की जनता की समृद्धि खुशहाली के लिए आशीर्वाद दें तथा सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें।

Thursday, June 25, 2020

स्व-सहायता समूह आदिवासी क्षेत्रों में भी सक्रिय हुए

गुरूवार जून 25, 2020, 19:00 IST
प्रवासी मजदूरों को इन्हीं के माध्यम से मिलेगा रोज़गार
भोपाल: 25 जून 2020: (मध्यप्रदेश स्क्रीन ब्यूरो)::
प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में प्रवासी आदिवासी मजदूरों और महिलाओं को स्व-सहायता समूह की गतिविधियों से जोड़कर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जाने के प्रयास किये जायेंगे। इसके लिये केन्द्रीय जनजातीय मंत्रालय ने प्रदेश की 65 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है। यह जानकारी प्रमुख सचिव, आदिम-जाति कल्याण श्रीमती पल्लवी जैन गोविल की अध्यक्षता में मंत्रालय में हुई बैठक में दी गई। प्रमुख सचिव ने विभिन्न जिलों के अधिकारियों से वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से चर्चा की। बैठक में संचालक, आदिवासी क्षेत्रीय विकास योजना सुश्री शैलबाला मॉर्टिन, ग्रामीण आजीविका मिशन, मेपसेट, कौशल विकास और बैंकर्स भी मौजूद थे।
प्रमुख सचिव, आदिम-जाति कल्याण श्रीमती गोविल ने बताया कि प्रदेश में रोजगार सेतु एप के माध्यम से प्रवासी मजदूरों के कौशल के अनुसार सर्वे किया गया है। इसके माध्यम से उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जायेंगे। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास किये जायें, जिससे प्रवासी मजदूरों और उनके परिवार को जल्द से जल्द आर्थिक लाभ मिलना शुरू हो जायें। प्रमुख सचिव ने बताया कि आदिवासी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में शैक्षणिक संस्थान हैं। इनमें होने वाली गतिविधियों से भी स्व-सहायता समूहों को जोड़ा जा सकता है।
बैठक में पशु एवं मत्स्य-पालन, पोल्ट्री फार्म, डेयरी से जुड़ी अन्य गतिविधियों, खाद्य प्र-संस्करण, रेशम और मधुमक्खी-पालन के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सृजित किये जाने पर चर्चा की गई। बैठक में बताया गया कि सीधी जिले में 31 हजार से अधिक प्रवासी श्रमिक जिले में लौटे हैं। धार जिले में करीब 34 हजार प्रवासी मजदूर जिले में लौटे हैं। इन्हें रोजगार से जोड़ने के लिये मनरेगा में सर्वे का कार्य किया गया है। आयुक्त, आदिम-जाति कल्याण श्री बी. चन्द्रशेखर ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में पूर्व में तैयार शेड का उपयोग इन गतिविधियों से जोड़ने के लिये किया जा सकता है। बैठक में जिला अधिकारियों को योजना के संबंध में प्रस्ताव देने के निर्देश दिये गये।

Sunday, June 14, 2020

कोरोना संक्रमण में मध्यप्रदेश अब देश में 8वें स्थान पर आया

रविवार 14 जून 2020, को 19:40 IST
 एक दिन में एक्टिव प्रकरणों में 151 की कमी आई, 300 मरीज ठीक हुए 
*सभी पैरामीटर्स में उल्लेखनीय सुधार
*रिकवरी रेट अब 71.1 प्रतिशत, डबलिंग रेट 34 दिन
*मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कोरोना की स्थिति एवं व्यवस्थाओं की समीक्षा की
भोपाल: रविवार 14 जून 2020: (मध्यप्रदेश स्क्रीन ब्यूरो)
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि कोरोना संक्रमण में प्रदेश की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। अब प्रदेश पूरे देश में आठवें स्थान पर आ गया है। प्रदेश के सभी कोरोना पैरामीटर्स में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। एक्टिव प्रकरणों में एक दिन में 151 की कमी आई है तथा 300 मरीज स्वस्थ होकर घर गए हैं। अब हमारे एक्टिव प्रकरणों की संख्या 2666 है। हमारी डबलिंग रेट बढ़कर 34.1 दिन तथा रिकवरी रेट 71.1 प्रतिशत हो गई है। यह प्रदेश के लिए बहुत अच्छे संकेत हैं।
मुख्यमंत्री श्री चौहान आज मंत्रालय में वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से प्रदेश में कोरोना की स्थिति एवं व्यवस्थाओं की समीक्षा कर रहे थे। इस अवसर पर मुख्य सचिव श्री इकबाल सिंह बैंस, डीजीपी श्री विवेक जौहरी, अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य श्री मोहम्मद सुलेमान उपस्थित थे।
रिकवरी रेट में मध्यप्रदेश भारत में दूसरे स्थान पर
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि रिकवरी रेट में मध्यप्रदेश भारत में दूसरे स्थान पर है। म.प्र. की रिकवरी रेट 71.1 प्रतिशत हो गई है, जबकि भारत की 50.6 प्रतिशत है। राजस्थान की सर्वाधिक 75.3 प्रतिशत है। गुजरात की 68.9, उत्तरप्रदेश की 60 तथा तमिलनाडु की 54.8 प्रतिशत है।
कोरोना संक्रमण में म.प्र. अब आठवें स्थान पर
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने बताया कि कोरोना संबंधी पैरामीटर्स में सुधार के बाद कोरोना संक्रमण में मध्यप्रदेश भारत में अब 8वें स्थान पर आ गया है। म.प्र. में 10641 कोरोना पॉजिटिव प्रकरण है। सर्वाधिक कोरोना प्रकरण महाराष्ट्र में 1,04,568, इसके बाद तमिलनाडु में 42,687, दिल्ली में 38,958, गुजरात में 23,038, उत्तरप्रदेश में 13,118, राजस्थान में 12,401 तथा पश्चिम बंगाल में 10,698 कोरोना पॉजीटिव प्रकरण हैं।
म.प्र. की डबलिंग रेट भारत में सबसे कम
मुख्यमंत्री ने कहा कि कोरोना संक्रमण की पूरे देश में मध्यप्रदेश में सबसे धीमी गति है। हमारी डबलिंग रेट 34.1 दिन है, जबकि भारत की 18.4 दिन है। गुजरात की 30.2 दिन, राजस्थान की 26.7 दिन, महाराष्ट्र की 21 दिन तथा उत्तरप्रदेश की 18.6 दिन है।
प्रभारी अधिकारी रोज मॉनीटरिंग करें
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि कोरोना की मॉनीटरिंग के लिए जिलेवार वरिष्ठ अधिकारियों को प्रभारी अधिकारी बनाया गया है। वे  रोज सुबह उठते ही तथा रात में सोने से पहले अपने जिले में कोरोना की स्थिति की मानीटरिंग करें, संबंधित कलेक्टर्स को मार्गदर्शन दें तथा इसकी रिपोर्ट दें।
कोरोना की मृत्यु दर को न्यूनतम करना है
बैठक में मुख्यमंत्री श्री चौहान ने निर्देश दिए कि प्रदेश में कोरोना की मृत्यु दर को न्यूनतम करना है। इसके लिए सभी कोविड अस्पतालों में सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित की जाए। ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल का पूरा पालन किया जाए तथा हर मरीज पर विशेष ध्यान दिया जाए।
जनता को जागरूक करना आवश्यक
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि लॉकडाउन खुलने के बाद अब जनजीवन सामान्य हो रहा है। अत: लोगों को जागरूक करना आवश्यक है कि वे सभी आवश्यक सावधानियां बरतें। मास्क लगाना, दो गज की दूरी रखना, इधर-उधर नहीं थूकना,  बार बार साबुन से हाथ धोना, सैनेटाईजर का उपयोग आदि सभी आवश्यक है। जागरूकता फैलाने के लिए  जनसहयोग लिया जाए।
प्रदेश के सर्वाधिक संक्रमित शहरों में अब भोपाल नहीं
एसीएस हेल्थ श्री मो. सुलेमान ने बताया कि भारत के सर्वाधिक संक्रमित 15 शहरों में प्रदेश का इंदौर शहर सातवें स्थान पर है। इस सूची में पूर्व में भोपाल भी शामिल था परंतु अब भोपाल इनमें नहीं है।